3 sentences that can save you from stress

Agree ??? Disagree ???

Stress is a word which everyone uses frequently may it be a 4 year child, 14 year boy or girl or 40 year women. The older we get the more commonly we use it. These 3 sentences are the tools I have used in my life to save me from stress, mostly if not all the time. Not talking too much on what, why and how, I put forth them:

1. Even if this concept/ idea is wonderful but I disagree !!!!

Disagreement is a normal thing in a conversation, in life, while planing something (big or small), deciding on which school, dress, food, toy are any dam thing for your child or even while playing if you are still a child. But!!!! we have not allowed it to be normal in our lives. What I mean here is, now a days disagreement is taken too seriously and we don’t believe in diversity of thoughts and approaches. We are afraid that expression of disagreement may lead to a hot discussion and finally to drifting away in a relationship, whether professional or personal. Actually hiding our actual opinion and shying away or fabricating a response is more dangerous. It reduces the chance of learning either yours or of your friend/ parent/ boss/ colleague in question. Expression of disagreement in subtle, calm manner with rightest choice of words is more beneficial than a fake agreement. Moreover its an irresponsibility to our own self when we believe in one opinion and agree upon another – making it one of the root cause of stress. So practice to express your views which may not agree to most in the room and own your disagreement.

2. Even if I can do it but I don’t want to do it

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Many a times we do things which we don’t want. May it be for sake of others’ happiness or maintaining peace, Just don’t do any thing because you are supposed to do that. Exceptions in this case are the situations of life and death for someone or when it comes to you boss’s order. Here you have no choice!!! In all other cases you have the right to say NO !! But again you must be capable enough to bear the consequences. It is important that we must learn to calculate what could happen afterwards and prepare ourselves for that. If the result is unpleasant it will be an experience and learning and if it is pleasant it’s a bonus. Usually, We find it easier to say “I Can’T DO” in place of “I Don’T want TO DO”. It can be safe escape too, but it brings stress to hide what YOU CAN. Many a times the person asking for a favor knows that you CAN, you have the expertise rather. It also starts a chain reaction of lying and hiding – which is another important root cause of stress. Say that plainly that you don’t want and wait for the time till it is digested by your friend, neighbor, colleague or partner.

3. It may be Simple BUT I DON’T UNDERSTAND THIS

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This is the most important sentences that works in most of the situation and is again a common thing. Let me put in a small story here. When I was a young girl studying in class 7th, Mathematics classes were most horrifying. Like most of the Mathematics teachers our Bariq sir was also too strict and discriminatory. He would easily identify the weak students and target them (atleast we felt this way). All of us (who were not so good in numbers) use to work extra for his class and were extra extra extra stressed too. Cause a poor mathematics = poor brain = poor marks = poor career = X = Y = what will others SAY!! One day a smart girl called Jyoti got admitted in our school. She was so confident that what she is good at and what she wants that she was not at all stressed of any of these XYZ things. She would enjoy Hindi Poem recitation, English drama, poltical debates and would talk about the current affairs of the world. Needless to say she wasn’t stressed in mathematics class, she was not even afraid of Bariq sir. When sir asked about why she got such a poor marks in mathematics or Why She could not get a simple concept of algebra ? (Look what he use to say….SIMPLE CONCEPT OF ALGEBRA !!!). Her answer would be always “It may be a SIMPLE thing sir but I DON’T UNDERSTAND IT….with a smile. She knew what she understood well and what she could do really well. So the key was accepting what you are good and even taking what you are not able to understand with same confidence. No peer pressure. No pressure of society and hence NO STRESS.

Ai Weiwei: Limited Edition: Quote Poster From Book: "Weiwei-Isms ...
Ai Weiwei

	

छोटी सी ग़लती…

एक छोटा सा लड़का लगभग पाँच छह साल का रोज़ एक फ़िश अक्वेरीयम की दुकान (जहां मछलियाँ और काँच के बड़े अक्वेरीयम बेचे जाते हैं) के सामने अपनी नानी के साथ गुजरता था। उसे पानी में तैरती रंग बिरंगी मछलियाँ बड़ी सुंदर लगतीं । वो अक्सर अपनी नानी से कहता “आप मम्मा को फ़िश अक्वेरीयम के लिए मनाओ ना नानी।”

नानी कहती कि “तुम्हारी माँ तो ऑफ़िस जाती है और तुम स्कूल के बाद हमारे घर रहते हो शाम तक फिर मछलियों का ध्यान कौन रखेगा? तुम्हारे नाना और मैं भी अब बूढ़े हो रहे है, तो बेटे ये तो हमारे लिए भी मुश्किल है।”

अब बस वो आते जाते उस दुकान के आगे कुछ देर ठहर जाते। नानी सामने बेंच पर बैठ जाती और वो लड़का मछलियों को देखता। दो चार दिन बाद दुकानदार ने पूछा बेटा मछलियाँ लेनी है क्या? उस मासूम ने पूरी कहानी ज्यों की त्यों बता दी। दुकानदार भी भला आदमी था उसने कहा अभी आप मेरी दुकान पर ही कुछ देर इन मछलियों को देखो, उन्हें दान दो और उनका ध्यान रखो और फिर थोड़े बड़े हो जाओ तो एक दिन ख़रीद लेना !

लड़का बहुत खुश हो गया और नानी को भी लगा चलो अच्छा है उसका मन लगा रहेगा । और बस अब तो रोज़ का रूटीन बन गया। पार्क के बाद मछली दुकान में पंद्रह बीस मिनट और फिर घर । दुकानवाले अंकल ने उन तीन मछलियों को एक छोटे फ़िश टैंक में डाल दिया और उसे रोज़, दाना देने की भी ज़िम्मेदारी दे दी। वो एकदम उत्साहित उन मछलियों का ध्यान रखता। लड़का खुश रहने लगा। उन मछलियों के नाम भी रख दिए।

एक दिन उसे शरारत सूझी उसने पार्क से कुछ पत्थर और पत्ते उठा लिए सोचा उन मछलियों के साथ कुछ नया खेल हो जाए । धीरे से उसने दो पत्थर टैंक में डाले लेकिन फिर एक पत्थर उछलता पानी में चला गया और “छपाक” की आवाज़ भी आ गई। लड़का घबरा गया और उसने पत्ते पानी में नहीं डाले और फिर डर के मारे ख़ूब सारे दाने दे दिए मछलियों को। जैसे ज़्यादा खिला के उनको ख़ुश करना चाहता हो और अपनी गलती छिपाना भी। दुकान से भी जल्दी लौट गया

उसे अच्छा नही लग रहा था, मन ख़राब था, और तो और उसने दो तीन पेट दर्द और अच्छा नही लगने का बहाना बनाया ताकि दुकान ना जाना पड़े। ऐसा लग रहा था जैसे अपने ही चक्कर में फँस गया था। नानी ने पूछने की कोशिश भी की लेकिन उसने कुछ बताया नही। तीन चार दिन बाद डर कम होने पर पर फिर दुकान पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी फ़ेवरेट मछलियाँ तो ग़ायब थीं। दुकान वाले अंकल ने बताया कि दो मछलियाँ मर गईं और एक को किसी ने ख़रीद लिया। आप इतने दिनों से रोज़ आते थे तो मैं उन्हें नहीं बेचता था लेकिन आप नहीं आये तो मैंने बेच दीं। पर बेटा आप आए क्यों नहीं ?

फिर उन अंकल ने कहा “मैंने उस दिन देख लिया था आपको पानी में पत्थर डालते और ज़्यादा दाने देते मगर कुछ कहा नहीं क्यूँकि आप एक अच्छे लड़के हो । लेकिन आपने मुझे ख़ुद नहीं बताया और भाग गए ये तो ठीक बात नही है ना?

लड़का रोआंसा हो गया “अंकल क्या मेरे कारण मछलियाँ मर गयी?” दुकान वाले ने कहा “नहीं बेटे मछलियाँ तो कई कारणों से मर जातीं है कभी मौसम या कोई बीमारी” इस बार अधिक दाने डाल देना भी एक छोटी सी ग़लती थी लेकिन अगर आप समय पर बता देते तो हम इसे सम्हाल भी सकते थे । या कम से कम मैं आप पर पहले की तरह विश्वास कर पाता। सच बताओ क्या आप परेशान नहीं हुए ऐसा कर के ?

(हम कई बार बिना सोचे समझे – अनजाने कुछ कह देते हैं या कोई काम कर जाते हैं जिनकी हम से उम्मीद नहीं होती ऐसी छोटी सी ग़लती से दूसरों को चोट पहुँचती है और यह और बड़ी हो जाती हैजिससे दूसरों के साथ साथ हम भी परेशान होते हैं ऐसे कामों से जितना हो सके बचना चाहिए)

शुभा

ख़ूब बिक रहा सामान अक़्लोंहोशियारी मापने का,

इंसानों की बस्ती में आजकल

जो कहीं मिल जाए चश्मा नीयत पहचानने का चश्मा

तो ज़रा हमें भी ख़बर करना

शुभा

बाज़ार…

बिक रही है हस्तियाँ, यादें, रिश्ते और रुसवाइयाँ

बिकता है हर कुछ यहाँ, बाज़ार है ये आदमी का

मकानों, दुकानों, डिग्रियों की शक्ल में

क़ीमत लगाई जा रही है आदमी की, सामान की तरह

बुलंदी के शिखर पर बैठ अक्सर सोचता है वो,

ख़रीद लिया उसने आदमी को

भूल जाता है लेकिन, इस बाज़ार में ही लगना है मोल,

एक दिन सभी का।।

ख़ूब बिक रहे हैं पैमाने, अक़्लोंहोशियारी मापने के

नीयत देखने का चश्मा जो मिलने लगे बाज़ार में,

हमको भी ख़बर करना…

कह के गया था कि लौटेगा नहीं कभी,

तंग गलियोंडिब्बेनुमा मकानों की बस्ती में

नज़र नीची कर लेता है आजकल वो

कि, होनी के आगे टिकता है कब ग़ुरूर किसी का ।।

पेड़ों से छनती धूप, फूलों से ढके रास्तों का शौक़ है सबको मगर

वीरान दिखता है हर वो मंज़र जहां से, गुजरता है कारवाँ आदमी का

हक़ ना समझो इस कायनात पर, जागीर की तरह

जब चाहा मिटा दिया उसे, जोतुम्हेंग़ैर ज़रूरीमामूली सा लगा

काश कि देख पाते तुम कि उजड़ गया जो चमन तुमसे

उसमें हर ज़र्रा, हर एक दरख़्त, घर था किसी का ।।

ख़ूब तरक़्क़ी कर ली है इन्सान ने चाँद सितारों तक, लेकिन

जिस दिन सुकून से सो सके हर बच्चा, हमको भी ख़बर करना

मुमकिन है बहुत कि ज़रूरतों की कसक और सिक्कों की खनक

भुला दे हर सबक नेकनीयत दुआओं और ईमानदारी का

याद रखना ये मगर, बाज़ार कभी नही चुका पाता मोल ज़िंदगी का ?

शुभा