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यादों की दस्तक

एक ओर किसी कच्ची सड़क पर दौड़ती हैं हँसी तो कहीं किराए की साइकिल पर निकल पड़ती है ज़िंदगी तुम आती हो तो बिखर जाती हैं यादों की लड़ियाँ कहीं ठंडी सी क़ुल्फ़ी तो कहीं खट्टी मीठी गोलियों वो कोने की दुकान के कई चक्कर लगाना बड़ों की बैठक से छुप कर भाग जाना फिर […]

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दीवारें तोड़ना चाहती हूँ मैं …..

कुछ मिनारें हैं बहुत ऊँची, रौशनी रंगीनियाँ से भरी मगर मगरूर हैं ये, कुछ ख़ुदगर्ज़ भी कि उम्मीदें हार जाती हैं चढ़ते चढ़ते कुछ पायदान ही निराश कर दे जो पथिक को, ऐसी ऊँचाई किस काम की बैठ कर इनके सिरों पर मुँह चिढ़ाती हैं मंज़िले ख़ुदगर्ज़ है बुलंदी इनकी, जो नाउम्मीद कर दें नौजवानों […]

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#माल_ए_मुफ़्त_दिल_ए_बेरहम

मुफ़्त वस्तुओं की आदत से लाचार होती हमारी नयी पीढ़ी का दोषी कौन? आजकल का फ़्री मोबाइल, लैप्टॉप, खाना आदि योजनाओं को देख कर एक कहानी याद आती है । अक्सर कहानियों के अंत में पूछे जाने वाले प्रश्न कि “इस कहानी से क्या शिक्षा मिली?” की तरह इसके अंत में भी हम उत्तर में […]

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एक कविता – दर्पण

दर्पण सुंदर दिखता इसमें छिपा माधुर्य कहीं तो कभी पीड़ा की भी छाप दिखी वीर कोई ललकारता, पुकारता हुंकारता सा या कोमल करुणा की प्रतीति कहीं है ख़ुशबू हँसी ख़ुशी की तो कभी चीतकारता रुदन है आइना है ये एक, धुँधला ही सही भावनाओं की है श्रद्धांजली सी कहानी, कविता, गीत हो या कथा कोई […]