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कहानी - किस्सों की बातें shubha’s stories Teacher’s Diary

छोटी सी ग़लती…

लड़का रोआंसा हो गया “अंकल क्या मेरे कारण मछलियाँ मर गयी?” दुकान वाले ने कहा “नहीं बेटे मछलियाँ तो कई कारणों से मर जातीं है कभी मौसम या कोई बीमारी” इस बार अधिक दाने डाल देना भी एक छोटी सी ग़लती थी लेकिन अगर आप समय पर बता देते तो हम इसे सम्हाल भी सकते थे ।

एक छोटा सा लड़का लगभग पाँच छह साल का रोज़ एक फ़िश अक्वेरीयम की दुकान (जहां मछलियाँ और काँच के बड़े अक्वेरीयम बेचे जाते हैं) के सामने अपनी नानी के साथ गुजरता था। उसे पानी में तैरती रंग बिरंगी मछलियाँ बड़ी सुंदर लगतीं । वो अक्सर अपनी नानी से कहता “आप मम्मा को फ़िश अक्वेरीयम के लिए मनाओ ना नानी।”

नानी कहती कि “तुम्हारी माँ तो ऑफ़िस जाती है और तुम स्कूल के बाद हमारे घर रहते हो शाम तक फिर मछलियों का ध्यान कौन रखेगा? तुम्हारे नाना और मैं भी अब बूढ़े हो रहे है, तो बेटे ये तो हमारे लिए भी मुश्किल है।”

अब बस वो आते जाते उस दुकान के आगे कुछ देर ठहर जाते। नानी सामने बेंच पर बैठ जाती और वो लड़का मछलियों को देखता। दो चार दिन बाद दुकानदार ने पूछा बेटा मछलियाँ लेनी है क्या? उस मासूम ने पूरी कहानी ज्यों की त्यों बता दी। दुकानदार भी भला आदमी था उसने कहा अभी आप मेरी दुकान पर ही कुछ देर इन मछलियों को देखो, उन्हें दान दो और उनका ध्यान रखो और फिर थोड़े बड़े हो जाओ तो एक दिन ख़रीद लेना !

लड़का बहुत खुश हो गया और नानी को भी लगा चलो अच्छा है उसका मन लगा रहेगा । और बस अब तो रोज़ का रूटीन बन गया। पार्क के बाद मछली दुकान में पंद्रह बीस मिनट और फिर घर । दुकानवाले अंकल ने उन तीन मछलियों को एक छोटे फ़िश टैंक में डाल दिया और उसे रोज़, दाना देने की भी ज़िम्मेदारी दे दी। वो एकदम उत्साहित उन मछलियों का ध्यान रखता। लड़का खुश रहने लगा। उन मछलियों के नाम भी रख दिए।

एक दिन उसे शरारत सूझी उसने पार्क से कुछ पत्थर और पत्ते उठा लिए सोचा उन मछलियों के साथ कुछ नया खेल हो जाए । धीरे से उसने दो पत्थर टैंक में डाले लेकिन फिर एक पत्थर उछलता पानी में चला गया और “छपाक” की आवाज़ भी आ गई। लड़का घबरा गया और उसने पत्ते पानी में नहीं डाले और फिर डर के मारे ख़ूब सारे दाने दे दिए मछलियों को। जैसे ज़्यादा खिला के उनको ख़ुश करना चाहता हो और अपनी गलती छिपाना भी। दुकान से भी जल्दी लौट गया

उसे अच्छा नही लग रहा था, मन ख़राब था, और तो और उसने दो तीन पेट दर्द और अच्छा नही लगने का बहाना बनाया ताकि दुकान ना जाना पड़े। ऐसा लग रहा था जैसे अपने ही चक्कर में फँस गया था। नानी ने पूछने की कोशिश भी की लेकिन उसने कुछ बताया नही। तीन चार दिन बाद डर कम होने पर पर फिर दुकान पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी फ़ेवरेट मछलियाँ तो ग़ायब थीं। दुकान वाले अंकल ने बताया कि दो मछलियाँ मर गईं और एक को किसी ने ख़रीद लिया। आप इतने दिनों से रोज़ आते थे तो मैं उन्हें नहीं बेचता था लेकिन आप नहीं आये तो मैंने बेच दीं। पर बेटा आप आए क्यों नहीं ?

फिर उन अंकल ने कहा “मैंने उस दिन देख लिया था आपको पानी में पत्थर डालते और ज़्यादा दाने देते मगर कुछ कहा नहीं क्यूँकि आप एक अच्छे लड़के हो । लेकिन आपने मुझे ख़ुद नहीं बताया और भाग गए ये तो ठीक बात नही है ना?

लड़का रोआंसा हो गया “अंकल क्या मेरे कारण मछलियाँ मर गयी?” दुकान वाले ने कहा “नहीं बेटे मछलियाँ तो कई कारणों से मर जातीं है कभी मौसम या कोई बीमारी” इस बार अधिक दाने डाल देना भी एक छोटी सी ग़लती थी लेकिन अगर आप समय पर बता देते तो हम इसे सम्हाल भी सकते थे । या कम से कम मैं आप पर पहले की तरह विश्वास कर पाता। सच बताओ क्या आप परेशान नहीं हुए ऐसा कर के ?

(हम कई बार बिना सोचे समझे – अनजाने कुछ कह देते हैं या कोई काम कर जाते हैं जिनकी हम से उम्मीद नहीं होती ऐसी छोटी सी ग़लती से दूसरों को चोट पहुँचती है और यह और बड़ी हो जाती हैजिससे दूसरों के साथ साथ हम भी परेशान होते हैं ऐसे कामों से जितना हो सके बचना चाहिए)

शुभा

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