बाज़ार…

बिक रही है हस्तियाँ, यादें, रिश्ते और रुसवाइयाँ

बिकता है हर कुछ यहाँ, बाज़ार है ये आदमी का

मकानों, दुकानों, डिग्रियों की शक्ल में

क़ीमत लगाई जा रही है आदमी की, सामान की तरह

बुलंदी के शिखर पर बैठ अक्सर सोचता है वो,

ख़रीद लिया उसने आदमी को

भूल जाता है लेकिन, इस बाज़ार में ही लगना है मोल,

एक दिन सभी का।।

ख़ूब बिक रहे हैं पैमाने, अक़्लोंहोशियारी मापने के

नीयत देखने का चश्मा जो मिलने लगे बाज़ार में,

हमको भी ख़बर करना…

कह के गया था कि लौटेगा नहीं कभी,

तंग गलियोंडिब्बेनुमा मकानों की बस्ती में

नज़र नीची कर लेता है आजकल वो

कि, होनी के आगे टिकता है कब ग़ुरूर किसी का ।।

पेड़ों से छनती धूप, फूलों से ढके रास्तों का शौक़ है सबको मगर

वीरान दिखता है हर वो मंज़र जहां से, गुजरता है कारवाँ आदमी का

हक़ ना समझो इस कायनात पर, जागीर की तरह

जब चाहा मिटा दिया उसे, जोतुम्हेंग़ैर ज़रूरीमामूली सा लगा

काश कि देख पाते तुम कि उजड़ गया जो चमन तुमसे

उसमें हर ज़र्रा, हर एक दरख़्त, घर था किसी का ।।

ख़ूब तरक़्क़ी कर ली है इन्सान ने चाँद सितारों तक, लेकिन

जिस दिन सुकून से सो सके हर बच्चा, हमको भी ख़बर करना

मुमकिन है बहुत कि ज़रूरतों की कसक और सिक्कों की खनक

भुला दे हर सबक नेकनीयत दुआओं और ईमानदारी का

याद रखना ये मगर, बाज़ार कभी नही चुका पाता मोल ज़िंदगी का ?

शुभा

2 thoughts on “बाज़ार…

  1. बहुत बहुत धन्यवाद
    प्रशंसा हमेशा उत्साह बढ़ाती है 😊😊👍🙏🏻🙏🏻
    और वो तीसरी लाइन वाली गड़बड़ तो मुझे समझ नहीं आयी
    क्या अभी भी repeat दिख रहा है ?

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