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हिंदी में........कुछ अपनी बात

साहब जी…. और एक आम आदमी ?

क्या इतनी पढ़ाई लिखाई सिर्फ़ इसीलिए की कि बस भूखे-नगों की सेवा करते रहें? बात करते हो…बड़ी बड़ी। देखेंगे तुम साहब बनोगे तो क्या तीर मार लोगे। ख़बरदार जो इतने प्रश्न पूछे!!!!

एक साहब रोज़ उस लड़के के घर के सामने वॉक करते करते बेंच पर बैठ सुस्ताते थे। सभ्य कपड़े, वॉकिंग के लिए स्पेशल जूता और बढ़िया फ़ोन जिस पर देश – विदेश, राजनीति, अध्यात्म से के कर अर्थव्यवस्था तक की बात करते। सो बच्चे समझ गया कोई पढ़ा लिखा “बड़ा” आदमी है।

लड़के ने एक दिन हिम्मत कर के पूछा “साहबजी क्या आप मेरी कुछ सहायता करेंगे?

ध्यान से देखते हुए……ये तो सामने घर वाला लड़का है जो घर के बाहर बैठ कर किताबें पढ़ता रहता है, फ़ोन वोन पर ज़्यादा नही रहता, नोटिस किया था उन्होंने भी, ख़ैर। प्रत्यक्ष में पूछा – क्या हुआ? क्या चाहिए? और मुझे “साहबजी” मत कहो ! मैं भी आम नागरिक हुँ, “बड़ी पोस्ट” में हुँ तो क्या हुआ? हुँ तो तुम्हारे ही जैसा (अंदर ही अंदर स्वयं गर्वित होते हुए)

कुछ सामान नहीं चाहिए सर, मैं ना राज्य सेवा आयोग की कुछ परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हुँ । उसमें current affairs में आप का मार्गदर्शन मिल जाए तो मेरी तैयारी अच्छी हो जाएगी। प्लीज़ आप हफ़्ते में एक दिन बस एक घंटा निकाल लें तो बड़ी कृपा होगी। (एक ही साँस में बोल गया लड़का मानो कई दिनों से याद कर रहा था)

ये तो बढ़िया बात है, देखो मैं तुम्हारी कितनी सहायता कर पाता हुँ। एक काम करूँगा कल से सैर पर आते वक़्त एक दिन पुराने दो तीन अख़बार भी लेता आऊँगा, तुम हफ़्ते भर पढ़ना और फिर हम डिस्कशन करेंगे। ठीक है? (पुनः साहब का चेहरा रौब से भर गया)

लड़के ने झट पैर छू कर धन्यवाद दिया और साहब घर की ओर चले गए। अगले दिन से अख़बारों का सिलसिला शुरू हो गया। लड़का भी होशियार था हफ़्ते के हफ़्ते तैयार रहता । और साहब को भी किसी पूर्वाग्रह के बिना डिस्कशन अच्छा लागत। लड़के को काफ़ी सहायता मिलने लगी।

साहब हमेशा उसे प्रश्न पूछने पर शाबाशी देते। वे खुश भी होते उस लड़के की हाज़िर जवाबी और बात की गम्भीरता को समझने की योग्यता पर। लड़के को लगता साहब और साहबों जैसे नहीं हैं वो तो सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का दम रखते हैं।

एक बार जब शहर में कुछ फ़साद हुआ तो साहब दस पंद्रह दिन नही आए। बाद में पता चला प्रशासनिक व्यवस्था में व्यस्त थे। ख़ैर फिर एक बार दिखे तो फिर सिलसिला शुरू हुआ, मगर अब साहब ज़रा रूखे – रूखे से लगते। उसे लगा कुछ परेशानी तो है…मगर कैसे पूछता..

एक दिन फिर ख़बर आई कि सरकार की मुफ़्त योजना के लाभ वितरण करने के दौरान भगदड़ मच गई। लड़के ने साहब से पूछा “सर आपको क्या लगता है कि पीड़ित लोगों को मुआवज़ा मिल जाएगा?

“हाँ वो तो सरकार को देना ही होगा” साहब बोले। लड़के ने फिर पूछा “मगर सर क्या मुआवज़ा सब का हल है?

साहब – नहीं, लेकिन दूसरी ओर उन्होंने भी तो फ़्री का माल लेने लाइन लगाई थी । सरकारी सम्पत्ति को जलाया भी है। सो सब एक से हैं

लड़का – सर ये क्या हिसाब हुआ, आम लोगों को सरकार ने ही बुलाया था। सरकार ने सही समय पर इंतज़ाम कर लिए होते और नेताओं ने लालच को बढ़ावा देने वाले भाषण नही दिए होते तो शायद ये हाल नहीं होता। और तो और अफ़सर भी तो ऊपर का माल हड़पने के चक्कर में ठेकेदारों के साथ भीतर मीटिंग में थे।

अरे चुप करो!!!” बहुत प्रश्न करते हो तुम!! ग़ुस्से में थे साहब।

“क्या कहा, सरकार? नेता? और क्या अफ़सर? क्या ये लोग आदमी नही है? ख़ुशी से नहीं रहें। क्या इतनी पढ़ाई लिखाई सिर्फ़ इसीलिए की कि बस भूखे-नगों की सेवा करते रहें? बात करते हो…बड़ी बड़ी। देखेंगे तुम साहब बनोगे तो क्या तीर मार लोगे। ख़बरदार जो इतने प्रश्न पूछे!!!!

लड़का सन्न था । एकदम चुप। आज उसे साहब बिल्कुल आदमी आम नज़र आ रहे थे।

11 replies on “साहब जी…. और एक आम आदमी ?”

बिटिया ने बनाया है नवनीत जी
मेरे blogs के कुछ फ़ोटो
को छोड़ कर सारे sketches उसी के हैं

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जी प्यारी चिड़ियाएँ जल्दी से माँ का ध्यान भी रखने लगती हैं

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