Categories
हिंदी में........कुछ अपनी बात

बिटिया…अब बड़ी हो जाओ

आज शाम को देखा कि अचानक दीवार के इधर और उधर वाली मेरी चाय का पार्ट्नर बदला हुआ है । मैं बाजू में रहने वाली भाभी अक्सर शाम को अपने अपने चाय के कप ले कर, बाउंड्री वॉल के एक एक ओर खड़े रह कर चाय पीते पीते कुछ गप- शप करते थे। आज देखा तो चाय के कप के साथ भाभी की बिटिया खड़ी थी । बिल्कुल हैरान परेशान सी । मुझे देखते ही पूछा “आंटी आप बताओ मम्मा क्या हमेशा थकी थकी सी लगती थीं। क्या उनके मन में हमारे ढेर सारी शिकायतें होती थीं?” मैं एकाएक समझ नहीं पायी लेकिन फिर बीते बरसों का पहिया वापस उल्टा घूम गया….

जब हम कई सालों पहले यहाँ रहने आए तो देखा कि पड़ोस में एक परिवार था जिसमें एक बिटिया थी, बड़ी प्यारी सी गुड़िया की तरह थी। उसके मम्मी पापा भी उसे परी की तरह रखते। ख़ास कर माँ की लाड़ली थी, हर बात अपनी माँ (भाभी) से कैसे मनवाना है उसे भली तरह आता था। उसे और उसकी शैतानियाँ देखते – सुनते हमारी शाम की चाय होती, दीवार के अपने – अपने साइड पर खड़े खड़े । उसके पापा (भैया) आते तो बातचीत का क्रम रुकता और मैं अपने रूटीन वो अपने रूटीन में लग जाते| कुछ दिनों में मेरी नौकरी लग गयी, मैंने दरअसल अपनी पढ़ाई शादी के बाद पूरी की थी। सो नौकरी – घर में दौड़ के बीच अब शाम की चाय फटाफट होती। भाभी अब भी अपनी परी बेटी की बातें करती ना थकतीं और अब तो बिटिया भी बन- ठन के खेलने निकलती। अब तो उसकी छोटी बहन भी अक्सर पूँछ की तरह पीछे लगी रहती । इधर मेरे बच्चे स्कूल जाने लायक़ हुए और उधर उस बिटिया ने बारहवीं पास कर कॉलेज में admission ले लिया। अब उसे देखती तो लगता समय कितनी जल्दी निकल गया। फिर मैं अपने घर परिवार में और व्यस्त होती गयी। अब हफ़्ते दो हफ़्ते में एकाध बार ही बात होती लेकिन भाभी जी का टॉपिक दोनों बेटियाँ ही होतीं। भैया भी अब कभी कभी हमारी गप्पों में शामिल हो जाते ।

दोनों की बातचीत का मुद्दा होता कि बेटियाँ पढ़ लिख कर लायक़ हो रही हैं तो ब्याह आदि कर हम संतोष से रहते। आम परिवारों में यही देखते आए होता भी आया है । बड़ी वाली ज़रा चंचल थी और बात मनवाने वाली और छोटी थोड़ी समझदार और बातूनी। बड़ी जहाँ किसी कम्पनी में जॉब पर थी तो छोटी भी अब कॉलेज पहुँचने की राह पर थी। दोनों बेटियाँ पूरे परिवार में चाचा मामा आदि की लाड़ली थीं, घर बाहर सारे जगह उनकी तारीफ़ होती, मुझे लगता ग़ज़ब बात है इस परिवार में … । कुछ दिनों में बड़ी ने अपनी माँ को मन की बात बताई कि साथ पढ़ने वाले लड़के से शादी करने की इच्छा है । वो लड़का अब उसके साथ ही नौकरी भी कर रहा था । थोड़ी ना नूकूर के बाद शादी हो भी गयी । अब तक जो घर की लाड़ो थी वो संयुक्त परिवार की बड़ी बहू बन गयी। सो घर और नौकरी में उसे शादी का असल भाव समझ आने लगा। अक्सर माँ से कहती थोड़े दिन और नहीं करती शादी तो ज़्यादा अच्छा होता। शुरु से ज़रा तुनकमिज़ाज थी और अपनी मर्ज़ी चलाने की आदी भी, इसलिए थोड़ी मुश्किल तो आई। फिर क्या दौड़ दौड़ माँ के पास, और माँ के पास तो हर मर्ज़ का इलाज होता है सो इसका भी था। वो आती और माँ से सलाह और सहायता मिल जाती । देखते देखते उसकी बेटी भी हो गई, अब तो काम और बढ़ गए और माँ की ओर दौड़ भी। मैंने देखा उसका आना – जाना अब भी पहले की तरह लगभग रोज़ होता। तबियत वग़ैरह ख़राब होने पर तो उसकी और उसकी बच्ची दोनों का ध्यान भाभी रखती। ऐसा नहीं कि बड़ी को काम से कोई डर या तकलीफ़ थी, वो तो दिन भर का काम निपटा कर, फिर ऑफ़िस भी का कर आती थी माँ के पास। माँ एक तरह से उसका भावनात्मक सहारा थीं, पापा ने भी पूरा सपोर्ट किया।

अब जब उसकी ख़ुद की बेटी स्कूल जाने लगी और उधर छोटी की भी शादी दूसरे शहर हो गई तब तक ज़ाहिर है हमारी भाभी जो अब तक नानी बन गई थीं, थकने लगीं थी। लेकिन उन्होंने कभी बिटिया को महसूस ना होने दिया। एक बार जब उन्हें छोटी वाली के घर किसी रीति रिवाज़ के लिए दो हफ़्तों के लिए जाना पड़ा। बिटिया को अपने घर की ज़िम्मेदारी दीं, वही कई सारी हिदायतों के साथ कि सुबह माली आ जाएगा, कि टिफ़िन में लाडो (उसकी ख़ुद की बेटी) को रोज़ फ़ास्ट फ़ूड मत देना, कि वो रोज़ डेढ़ बजे आ जाती है तो ऑफ़िस से आ ही जाना, कि बाई को अपने सामने ही काम करवाना, कचरा रोज़ बाहर डलवाना आदि आदि आदि….. माँ के चेन्नई जाने के बाद बड़की का तो हाल बेहाल था। रोज़ up to date रहने वाली लड़की अब घर की सारे काम में आईलाइनर ही लगाना भूल जाती। अब उसे माँ और घर की घरनी होने का पूरा अहसास हो रहा था। उसे लगता कि माँ को काम ही क्या रहता है !! कभी तो माँ जब खाने – रूटीन वग़ैरह पर ज़ोर देती तो वो उन पर कंझा भी जाती थी। आज जब सब काम कर हाथ में थाली के कर बैठते ही घंटी बज जाती या बिटिया ही रोने लग जाती तो उसे रोना सा आ जाता। मुझे ये भी ध्यान आया कि इसने अपने पति से भी पिछले कुछ दिनों से ठीक से बात नहीं की थी।…..

मैं अपने में ही खोई थी कि फिर कहा “मुझे तो लगता है कि मेरी विदाई शादी के कई साल बाद हुई है। मुझे तो आज तक मम्मा के बिना रहना ही नहीं आता। लेकिन उनका सोचती हुँ तो लगता है कि वो क्या महसूस करती थीं….. बताओ ना आंटी मम्मा क्या हमसे बहुत परेशान रहती थी? “

मेरा जवाब बड़ा सीधा सा था “बड़की तुम्हारी मम्मा और सारी माएँ तो घर का काम आदतन निपटा लेती हैं। उन्हें बच्चों का ध्यान रखना अच्छा लगता है यही तो प्यार है। और हाँ ये भी देखना था तुम्हें हर माँ तुम्हारे पापा के भी रूटीन और मूड का ध्यान रखतीं हैं ( उसे ध्यान आया कि कितने दिनों से अपने पति के साथ ठीक से बैठ कर बातें भी नहीं हो पाई थीं) । मम्मियाँ ये सब बड़ी आसानी से कर पाती है क्यूँकि वो आप सब के लिए ज़िम्मेदार होती हैं! इसी को बड़ा होना कहते हैं बिटिया, हैं ना?

“हाँ आंटी आप ठीक कह रहे हो अब मेरे भी बड़े होने का वक्त आ गया है ।”

8 replies on “बिटिया…अब बड़ी हो जाओ”

दीदी आपका ब्लॉग पढ़ते समय पूरी एक स्टोरी नज़र आने लगती है। एक एक शब्द का चित्रण हमें अंत तक जोड़कर रखता है।

बहुत अपना सा लगा पढ़कर

Like

बहुत बहुत धन्यवाद विकास भाई
आप पूरा पढ़ कर comment करते हैं तो मेरा उत्साह बना रहता है 🙏🏻

Like

I weigh 65 again ये नया वाला ब्लॉग पढ़ कर भी बताइएगा कैसा लगा (सच में)

Like

बिल्कुल सही कहा।यही हमारे समाज का ढर्रा है।पर कभी-कभी कहीं गलत भी हो जाता है बेटियों के साथ।

Like

जी बेटियों को और उनके अभिभावकों को हमेशा ही ध्यान देना होता है संतुलन पर

Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s