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कहानी - किस्सों की बातें shubha’s stories Decision making, Fear, Confidence, wisdom

क्या चाहती है हम से ज़िन्दगी…?

“ऋत्विका ने ऐसा क्यूँ किया समझ नहीं पा रहा हुँ, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका रूटीन बदला सा था और चिढ़ भी अधिक हो गयी थी उसकी। क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा….” (मेरे पास भी कहाँ कोई उत्तर था कि ऐसे समय में क्या किया जाए। हम तो धमकाने चमकाने या उपदेश देने का ही तरीक़ा जानते हैं। और इनको तो शायद वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा भी नहीं)

अरे सुना वो सिन्हा जी की बेटी ने आत्म….कहते भी डर लगता है, कहीं हमारे बच्चे सुन कर वैसा ना सोचने लगें।

क्या हुआ बताओ तो, ऋत्विका ठीक तो है ना!! (मैं व्याकुल था)

हाँ अभी तो ख़तरे से बाहर है, लेकिन शॉक का असर जाते समय लगेगा और ज़ख्मों के निशान भी कलाई से इतनी जल्दी जाने वाले नहीं । भाभीजी का तो रो रो कर बुरा हाल हुआ है ।

(क्या हुआ होगा और क्यों, ऋत्विका तो अच्छी बच्ची है, पढ़ने लिखने में तेज, संवेदनशील। कुछ शौक़ से और कुछ प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी के लिहाज़ से जर्नलिज़म पढ़ रही थी, सो मेरे घर अक्सर आना होता….वो मुझे गुरु अंकल भी कहती थी, ख़ैर….)

अब तक तो सबको पता चल गया होगा, भाई साहब की फ़ज़ीहत ……वो सब छोड़ भी दो तो भी चोट के निशान वग़ैरह भी देर तक पीड़ा  देंगे……. मन को और तन दोनों को ही……..मैं सोच में ही गुम था कि पत्नी ने फिर कहा ‘कोई कह रहा था कल के अख़बार में भी आ जाएगा….” (उसे लग रहा था कि मैं कुछ कर क्यूँ नहीं रहा)

…ओह मैं बात करता हूँ अपने रिपोर्टर साथियों से … कम से कम बिटिया का और भाई साहब का नाम ना लिखे। और हाँ तुम तैयार हो जाओ चलते हैं मिलने अभी…….(मैंने एक दो जगह फ़ोन मिलाया, पता चला बात कुछ गड़बड़ ही है एक साथी ने कुछ लत की ओर भी इशारा किया, उफ़्फ़ ये नई पीढ़ी भी….)

उनके घर पर कुछ लोग पहले से ही मौजूद थे, भाई साहब सिर को हाथ पर टिकाए चुप से खड़े थे । सम्बंधियों से उन्हें सम्बल कम और प्रश्न अधिक मिल रहे थे मैंने उन्हें एक ज़रूरी कारवाही के अंतर्गत फ़ोन आने का बहाना कर के अंदर कमरे के पास बुलाया।

अकेले में तो फफक ही पड़े… कहने लगे “ऋत्विका ने ऐसा क्यूँ किया समझ नहीं पा रहा हुँ, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका रूटीन बदला सा था और चिढ़ भी अधिक हो गयी थी उसकी। क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा….” (मेरे पास भी कहाँ कोई उत्तर था कि ऐसे समय में क्या किया जाए। हम तो धमकाने चमकाने या उपदेश देने का ही तरीक़ा जानते हैं। और इनको तो शायद वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा भी नहीं)

प्रत्यक्ष में इतना ही कह पाया सही बात है भाई साहब हमने resource मैनेजमेंट की ट्रेनिंग तो खूब ली है लेकिन रिश्ते मगर हम ऐसी स्थिति को  कैसे समझें, क्या करें….. इसकी ट्रेनिंग तो किसी पाठशाला में नहीं मिली | अब जो है साथ झेलेंगे | क्या मैं ऋत्विका से बात करूँ ? (मुझे लगा अब ये बात वहीं सुलझेगी और कोई चारा भी नहीं।)

हालाँकि उनके मन में कुछ शंका थी, कि जो वो ना समझ पाए तो मैं क्या ख़ास कर लूँगा, फिर भी कहा ” कुछ दिन ठहर जाइए फिर आप को जैसा ठीक लगे, आप भी तो उसके गुरु अंकल ही हैं ना “

अगले हफ़्ते मैं फिर पहुँचा तो ऋत्विका बेड के किनारे, नीचे बैठी, ज़मीन पर उँगलियों से कुछ लिख रही थी मिटा रही थी… मानो कुछ डिलीट या अनडू करना चाहती थी। (इस पीढ़ी को कम्प्यूटर व स्मार्ट फ़ोन की आदत से सब undo या delete करके फिर नया लिखने की आदत सी है । शायद यह किया भी जा सकता है, लेकिन फिर भी ज़िंदगी में undo किए हुए के निशान रह जाते हैं जो इस वक़्त उसकी कलाई पर बैठे थे ) इस प्यारी सी बच्ची का क्या हाल हो गया है…..

ऋत्विका……ऋत्विका बेटा !

जी अंकल, आ गए आप (ख़ुशी में तकलीफ़ मिक्स थी उसके, मानो कह रही हो “शुरू हो जाओ अब आप की बारी”)

बाहर जाओगी? कॉफ़ी पीने चलें? (उसकी आँखे आश्चर्य से फैल गई लेकिन संशयअभी भी बना हुआ था कि कहीं मैं प्रश्नों की बौछार ना कर दूँ अकेले में)

ख़ैर वो कुछ सोच तैयार हो गयी, चुपचाप कार चलाते कैफ़े भी पहुँच गए, ना वो बोल रही थी ना मैं। सहज कुछ भी नहीं था

वहाँ tv पर जिसमें कोई म्यूज़िक चैनल चल रहा था, जिसमें माउंटेन ड्यू (dew) का ऐड आया  “डर के आगे जीत है” और उसका मूड बिल्कुल ख़राब हो गया। सब बकवास है ……(धीरे से कहा उसने)

अगला विज्ञापन किसी बैंक या बीमा कम्पनी का था “जीयो तो सर उठा के जीयो“, इस ऋत्विका और परेशान हुई | बिफरते हुए बोली “सब बेकार की बातें हैं अंकल ऐसी कुछ नहीं होता | ज़िन्दगी में तो रोज़ एक लड़ाई है और रोज़ एक क़िस्सा है, चाहे हार का हो या जीत का ।  मुझे तो  लड़ते लड़ते अपने जीतने की कम और दूसरे की हार की आशा अधिक करते, एक अजीब सी थकान होती है । घुटन सी लगती है !” एक ही साँस में सब बोल गई वो, मानो किसी ने सोडे की बोतल का कॉर्क खोल दिया हो

फिर मेरी और देखती रही  और फिर पूछा क्या आप नहीं थकते ?

थकता हूँ मैं भी कभी कभी……पहले अक्सर थक जाता था, तब जब ज़िन्दगी जंग सी लगती थी….

अब ? उसने फिर पूछा

मैंने कहा अब मैंने ज़िदगी से लड़ना छोड़ उसे दोस्त बना लिया है….थोड़ी नकचढ़ी थोड़ी जिद्दी दोस्त है लेकिन साथ अच्छा निभाती है ज़िन्दगी….मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा उसने ……

क्या करते हैं आप अंकल जब थका देती है ज़िन्दगी ? (लगा उसे मेरी इस साहित्यिक बकबक में इंटरेस्ट नहीं है)

कुछ ख़ास नहीं जैसे तुम अभी पुछ रही हो, मैं भी उस से पूछता हूँ…क्या चाहती है तु ज़िन्दगी? (उसके भाव फिर वैसे ही हो गए ……बक बक वाले…)

मैंने उसे पूछा, तुम क्या करती हो बताओ, जब ऐसा लगता है?

पहले मॉम पापा से बात करती थी पर वो तुरंत ज्ञान देने – समझाने लगते हैं कि बेटा यही तो ज़िंदगी है और हमें ऐसे ही जीना है ….आदि आदि, फिर….

फिर? मैंने फिर पूछा

फिर क्या! सुकून ढूँढने निकल जाती हूँ किसी दोस्त के साथ ….. एक तो मेरे ज़्यादा दोस्त भी नहीं हैं, इस कॉम्पटिशन ने सब दूर करा दिए, हैं एक दो गिने-चुने दोस्त। लेकिन सब एक से बढ़ कर एक लूज़र………….(वो अचानक चुप हो गयी, जैसे कुछ निकल ना जाए उसके मुँह से )…आप जानते हैं अंकल, life was rude to me and also to my friends….

क्या …दूर हो जाती है परेशानी इस तरह ? तब तो ठीक है तुम्हारे दोस्त, लूज़र कहाँ हुए ? (मैंने फिर ज़रा बेपरवाही दिखाते पूछा)

थोड़ी देर के लिए टाल देती हूँ बस, वो खुद कोई खुश हैं क्या ? सबकी अपनी दिक्कते हैं ….कहा न मैंने ज़िन्दगी वैसी नहीं होती जैसी कहानियों में फिल्मों में दिखती है | हमने इतना किया फिर भी ज़िन्दगी खुश नहीं है ना हमें ही ख़ुशी से जीने देती है …….

तुमने पूछा उस से ?

किस से अंकल ? (कंझा गई वो )

ज़िन्दगी से ! और किस से … (मैं भी कहाँ हार मानने वाला था)

आप ही बता दो अंकल कैसे पूछते हैं ज़िन्दगी से ? (मूड भयंकर ऑफ हो रहा था उसका) आप तो बड़ी बातें करते हो ज़िन्दगी से …? (तीखा ताना मारा उसने, लेकिन मैं खुश था मन ही मन, कम से कम वो कुछ बोल रही थी )

वैसे ही जैसे तुम “ज़िदगी के लिए इतना कुछ करती हो” तुमने ही कहा न “इतना कुछ किया लेकिन फिर भी ज़िन्दगी खुश नहीं है ”  तुमने जिसकी ख़ुशी के लिया उसी से पूछो वो चाहती क्या है ?

“अरे यार अंकल लगता है… हादसा मैंने किया है और शॉक आपको लग गया है (बिफर गई फिर से…..)

मैंने फिर पुछा “ऋत्विका क्या तुमने कभी ज़िंदगी से पूछने की कोशिश की, कि वो तुमसे क्या चाहती है ? क्या तुम्हारी कभी बात हुई उस से?

वो आश्चर्य से देखती रही…मानो कह रही हो are you mad? कहने लगी “क्या अंकल क्या ज़िंदगी कोई इंसान जिससे मैं मिलूँ या बात कर सकूँ? आप इतने फ़िलासफ़ीकल कैसे हो सकते हैं?

मैंने बेहद धीमे से कहा “बेटा तुम ही बताओ तुम किस ज़िन्दगी को खुश करना चाहती हो? तुम्हे किसे खुश करना है औरों को या अपने मन को ? अगर खुद को ही खुश करना है तो इसका उत्तर भी तुम्हारे ही भीतर है ….कि तुम्हे जब थकान लगे तो क्या करना है…कि तुम्हे थकान लग ही क्यों रही है ? कि तुम वास्तव में चाहती क्या हो?

अगर तुम्हे इन प्रशनों के उत्तर न मिलें तो अपने उन दोस्तों तुम खुद यह भी पूछो “कि क्या वास्तव में उन्हें पता है कि उन्हें उनकी ज़िन्दगी में…ज़िन्दगी से नहीं….ज़िन्दगी में क्या चाहिए”

बेटा हमें कोई और नहीं अपना मन ही बताता है कि हमें क्या करना है ? बस ऐसा कुछ होता है कि हम अपने मन की जगह दुसरे के “कद” को पढने – सुनने में लग जातें हैं ” और कभी फिर मन भी बिगड़ कर बहकने लगे तो याद रखना कि तुम क्या चाहती हो खुद से”

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