क्या हल ढूँढना इतना मुश्किल है….

अचानक एक दिन उस से फिर मुलाक़ात हुई, वही मेरी बिटिया के साथी की मम्मा, वही जिसका पति (याद आया वो टाल, डार्क हैन्सम ) जो अनजाने ही अपने पिता के विचारों का ग़ुलाम था, ।तो वो और मैं भी अन्य माँओं की तरह बाहर बैठ बच्चों की इग्ज़ाम एंडिंग पार्टी के एंड होने का इंतज़ार कर थे। हम दोनों की ही किसी और महिला की साड़ी, लिप्स्टिक , कान के टॉप्स में रुचि नहीं थी सो एक कोने में अपने मोबाइल में घुसे बैठे थे। मुझे लगा वो फ़ोन पर किसी से बात करते हल्के हल्के रो रही है, देखा वो वास्तव में परेशान थी……पति फ़ोन पर ही भड़क रहा था कि गिटार क्लास की जगह कहाँ पार्टी में ले गयी बेटे को। मेरे पानी का गिलास देते ही उसकी आँखो से आँसू लुढ़कने लगे जिसे छिपाने उसने मुँह फेर लिया…मैंने भी कुछ देर उसे अकेला छोड़ना ही उचित समझा।

लगभग बीस मिनट में एक हल्की सी आवाज़, आप क्या करती हैं.?

मैं एक लिखती हूँ, एक समाचार पत्र के लिए।

अच्छा, तो घर में खाना आप ही पकाती हैं?

(ये कैसा सवाल है..) मैंने कहा हाँ , अमूमन मैं और ज़रूरत पड़ने पर सास या पति या फिर बाहर…

आप ख़ुश हैं? (मेरी बात ख़त्म होने से पहले उसका अगला प्रश्न जाता)

(मैं बुरी तरह चौंक गई) हाँ….क्यूँ

लगता तो नहीं ( हद हो गई, रो ये रही थी और ख़ुश मैं नहीं?)

…..मैं चुप!!

नहीं दरअसल कोई इतनेजल्दी किसी का दुःख तभी देख पाता है जब वो ख़ुद परेशान हो …देखिए यहाँ और भी तो लोग हैं ना

(अच्छा तो ये analysis है) मैंने प्रत्यक्ष में इतना ही कहा “हाँ अधिकतर ख़ुश रहती हूँ, कभी कभी परेशान भी लेकिन ये मानती हूँ कि हल निकल ही आएगा, आता भी है, सो ज़्यादातर ख़ुश रहती हूँ ।

सभी परेशानियों का हल मिल जाता है आपको? ऐसा तो नामुमकिन है। अब ये मत कहिएगा नामुमकिन कुछ भी नहीं (अब हंस पड़ी वो)

…..मैंने कहा “हाँ बात तो आपकी सही है लेकिन मेरा विश्वास है कि हल तो है और ये हल मुझे ही ढूँढना होगा। अगर मैंने अपनी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं की तो मैं ख़ुद एक प्रॉब्लम बन जाऊँगी अपने परिवार के लिए ( समझ नहीं आ रहा था कि मैं इस महिला को अपनी इतनी जानकारी क्यों देते जा रही थी..,ख़ैर जो भी हो ये महिला थी बड़ी इंट्रेस्टिंग)

आप किसी दार्शनिक की तरह बोल रहीं है, ऐसा होता नहीं कि हम हर परेशानी से बाहर आ पाएँ वो भी ख़ुद, (खट्ट से बोल पड़ी वो)। लगता है आपको सब बड़ी आसानी से मिल गया है या आपकी प्रॉब्लम आपके पास आने से पहले किसी ने सहायता कर दी । …….हमारा तो ख़ुद ही कुआँ खोदना और ख़ुद ही पानी पीना भी पिलाना भी वाला हाल है…..और तो और एक परेशानी ख़त्म होती नहीं दूसरी शुरू हो जाती है। (लग रहा था बहुत कुछ उबल रहा था उनके भीतर)…

मैंने पूछा आप खाना तो बनाती ही होंगी, एक बार में कितनी चीज़ें पका लेती हैं?

वो – रोज़ चार पाँच चीज़ें तो बनती ही है, सब लगभग एक साथ बनाती हूँ। इनका टिफ़िन, बच्चों का नाश्ता और सास ससुर का खाना सब एक साथ कर के ही घर से निकल पाती हूँ…..

अरे एक साथ सब बनाना कितना कठिन है किसी में नमक, किसी में शक्कर तो कुछ खट्टा…किसमें क्या डालना है, कितना मिलाना – पकाना है ….उफ़्फ़ नामुमकिन है …आप सचमुच कर लेती हैं? (मैंने पूछा)

मैंने फिर पूछा ये सब कैसे कर लेती हैं आप, एक साथ, कहीं फ़ूड मैनज्मेंट का कोर्स किया है क्या?

(हँसते हुए) …..माँ से सिखा था धीरे-धीरे, फिर एक एक चीज़ बनाई और फिर पूरा खाना….हाँ, पहले थोड़ी दिक्कत थी आदत जो नहीं थी…अब तो ध्यान भी नहीं जाता और खाना तैयार (उसे लगा उसे भी कुछ आता है)

(मैंने अब उसका हाथ पकड़ कर कहा) समस्याए सुलझाना भी ऐसा ही है, पहले सीखिए, धीरे धीरे कुछ प्रॉब्लम सॉल्व करने की कोशिश करिए……फिर आदत पड़ जाएगी……हल करते रहने की….सिम्पल।

बच्चे आ गए, हम चलने लगे……मैंने उसे विदा लेते हुए पूछा …क्या हल ढूँढना इतना मुश्किल है?

3 thoughts on “क्या हल ढूँढना इतना मुश्किल है….

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