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हिंदी में........कुछ अपनी बात

जाग जाओ

कोई एक घटना घटते ही

एक ओर शुरू हो जाते है

क़िस्से कहानी और कविता

और उधर चल पड़ती

बाल की खाल निकालती

खोजी पत्रकारिता

कुछ मिले ना मिले इन्हें

किसी ना किसी के सर पर

फोड़ा जाता है ग़लतियों का ठीकरा

सबकी दुकान चल निकलती है

कहीं राजनीति हावी होती है

तो कही कुछ इसकी कुछ उसकी

और एक दिन

सब हो जाता है पहले जैसा

वही मौसम पे चर्चा

सितारे की शादी और

सैनिकों की शहीदी में

हमने ख़ास फ़र्क़ छोड़ा नहीं

धोखा – अपराध भी अब

हमारे लिए बड़ी बात नहीं

अख़बारों में ऐसी ख़बरो को पढ़ने की

हो गई है आदत सी

देखें ज़रा ग़ौर से

ये ढोंगी पापी – भेड़िये

आते नहीं बाहर से कहीं

पनपते है ये

हमारे जैसे घरों में ही

क्यूँकि खेलने लगे है हम

तेरी ग़लती – मेरी ग़लती

वाला खेल घरों में ही

आरोप – प्रत्यारोप के दौर

चलते रहते हैं अनंत

कहीं मानवता या विश्वास का छोर नहीं

दोगलेपन, स्वार्थ और ‘मैं – मैं’ ही की चर्चा

जाने कब से बेनतीजा चल रही

स्तरहीन हो रही है

मानव संस्कारो की परम्परा

जाग जाओ अब

ज़िंदगी सिर्फ़ नम्बरों का खेल नहीं

जागे नहीं अब भी

तो पुनः पाषाण युग

पहुँचने में देर नहीं

शुभा झा बैनर्जी

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