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#माल_ए_मुफ़्त_दिल_ए_बेरहम

मुफ़्त वस्तुओं की आदत से लाचार होती हमारी नयी पीढ़ी का दोषी कौन? आजकल का फ़्री मोबाइल, लैप्टॉप, खाना आदि योजनाओं को देख कर एक कहानी याद आती है । अक्सर कहानियों के अंत में पूछे जाने वाले प्रश्न कि “इस कहानी से क्या शिक्षा मिली?” की तरह इसके अंत में भी हम उत्तर में हम कहते कि “मछुआरे को मछली दान करने से अच्छा है कि उसे अच्छी तरह मछली पकड़ना सीखा दिया जाए ताकि वह जीवन भर स्वावलंबन से आत्मनिर्भर हो सके”। आज हर ग़रीब / अमीर छात्र को “वस्तुयें” मुफ़्त में बाँटी जा रही हैं लेकिन इनके लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा – सुविधा देने के लिए केवल काग़ज़ी नीतियाँ हैं । अन्यथा सरकारी स्कूलो में जगह पाने के लिए लाइन लगी रहती, केंद्रीय विद्यालय इस व्यवस्था का उदाहरण हैं। राज्य के सरकारी स्कूलों की ओर ध्यान क्यूँ नहीं जाता? ये किस तरह की “राज्यनीति” है जो मुफ़्तखोरी की आदत डाल रही है?

इसी तरह महिलाओं को और बच्चों को मुफ़्त फ़ोन और लैप्टॉप बाँटे जा रहे हैं। क्यूँ? क्या भीख माँगने की आदत डाली जा रही है। मैंने देखा तो नहीं लेकिन सुना था कि भारत में चाय की आदत डालने के लिए पहले फ़्री में और फिर अत्यंत सस्ते दामों में चाय बाँटी जाती थी। आज आदत पड़ने के बाद ये एक बड़ा उद्योग है, तो मोबाइल बाँटने या इस तरह के उपकरण फ़्री बाँटने से किसको फ़ायदा है। फिर वही बात है कि राज्य में महिलाओं और छात्रों को वास्तविक लाभ पहुँचाना है तो कम से कम 18 साल की उम्र तक लड़की – लड़के और गर्भवती महिला के स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी राज्य ले। जिम्मेदारी का मतलब अच्छा इलाज सभी को मिले, ग़रीबों को सरकारी अस्पताल का जनरल वार्ड और अमीरों को प्राइवेट अस्पताल के प्राइवेट वार्ड नहीं। जो भी भारतीय है वो केवल आधार कार्ड जैसे किसी पहचान पत्र से ही इस तरह की व्यवस्था का हक़दार हो, जाति, मायनॉरिटी या धन के आधार पर नहीं। सरकारी अस्पतालों में ग़रीबों और मध्यम वर्गीय लोगों को प्राथमिकता मिले लेकिन हर सरकारी अस्पताल किसी अच्छे प्राइवेट अस्पताल की तरह साफ़ सुथरा और सुविधापूर्ण हो। जितना पैसा सामान बाँटने में लगता है उसमें ये दोनों लक्ष्य आसानी से पूरे हो सकते हैं । रही बात भ्रष्टाचार की और इन सुविधाओं के दुरुपयोग की, तो ये भ्रष्टाचार या दुरुपयोग उन बड़े घोटालों की तुलना में कम ही हैं जो हाई-प्रोफ़ायल लोगों की मिलीभगत से होते हैं। आम आदमी तो शिक्षा और स्वास्थ्य के जुगाड़ के लिए ही सब करता है । वैसे भी अच्छा स्वास्थ्य व अच्छी शिक्षा ही आधी से अधिक समस्याओं से निजात दिला सकता है । ऐसी नीतियाँ पूरी सरकारी अमले के अच्छे संचालन से लागू की जा सकती हैं लेकिन किसी एक व्यक्ति या पार्टी के लाभान्वित नहीं करती । शायद इसी लिए किसी भी पार्टी की इस तरह के कार्यक्रम में रुचि नहीं दिखती। ग़लती केवल मुफ़्त देने वालों की ही नहीं है हम भी झोली फैलाए अपना अपमान स्वयं कर रहे हैं। शिक्षा का स्तर व शिक्षक कैसा भी हो या स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी भी हों हमें तो केवल फ़्री के माल में रुचि है….लेकिन वो सुना तो होगा ही “माल ए मुफ़्त दिल ए बेरहम” । याद रहे एक दिन ये मुफ़्त के सामान दीमक की तरह हमारे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को ख़त्म कर देंगे, तब किसके सामने झोली फैलाएँगे ???

3 replies on “#माल_ए_मुफ़्त_दिल_ए_बेरहम”

Well said Shubha.
I agree with you…the money has to be spent at the right places to ensure improvement in services ….Free doles finishes a society…
Regards

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